The Regiment of Liberty: Subhash Chandra Bose and His All Women Regiment

 

देश को आज़ादी दिलाने में अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण योगदान रखने वाले सुभाषचंद्र बोस की आज 122 वीं जयंती है. स्‍वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका को कभी नहीं भुलाया जा सकता. 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में एक संपन्न बांग्ला परिवार में जन्मे सुभाष अपने देश के लिए हर हाल में आजादी चाहते थे. उन्होंने अपना पूरा जीवन देश के नाम कर दिया और अंतिम सांस तक देश की आजादी के लिए संघर्ष करते रहे.

कॉलेज से ही अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे सुभाष

सुभाष ने जब कोलकाता के प्रसिद्ध प्रेसीडेंसी कॉलेज में एडमिशन लिया, वो जबरदस्त मेघावी छात्र थे. हमेशा पढाई में डूबे रहते थे,  लेकिन इसी बीच एक घटना ऐसी हुई, जिसने उनके जीवन की दिशा तय कर दी.

वह उस दिन कॉलेज की लाइब्रेरी में थे तभी पता चला कि एक अंग्रेज प्रोफेसर ने खीझ में उनके कुछ साथियों को जोर से धक्का दिया है. चूंकि सुभाष ही क्लास के रिजेंटेटिव थे, लिहाजा तुरंत प्रिंसिपल के पास पहुंचे. इस बात की जानकारी दी. अंग्रेज प्रोफेसर का रवैया चूंकि बहुत खराब था, इसलिए सुभाष चाहते थे कि वो प्रोफेसर माफी मांगें. प्रिंसिपल ने खारिज कर दिया.

नतीजतन अगले दिन से छात्र हड़ताल पर चले गए. पूरे शहर में जब ये खबर फैली तो हड़ताल को समर्थन भी मिलने लगा. आखिरकार प्रोफेसर को झुकना पड़ा. दोनों पक्षों के बीच एक सम्मानजनक समझौता हो गया. कुछ ही दिनों बाद जब उसी अंग्रेज प्रोफेसर ने फिर यही हरकत की तो छात्रों ने कानून को हाथ में लेते हुए बल प्रयोग किया. एक जांच समिति बनी, जिसमें सुभाष ने तर्कों के साथ छात्रों का पक्ष रखा. उनकी कार्रवाई को परिस्थितिवश सही ठहराया. जिस पर कॉलेज के प्रिंसिपल ने उन्हें कुछ छात्रों के साथ काली सूची में डाल दिया. सुभाष को कॉलेज से ही नहीं बल्कि यूनिवर्सिटी से भी निकाल दिया गया.

करीब एक साल तक सुभाष ने किताबें किनारे रख दीं. जी-जान से समाजसेवा में जुट गए. वो अपने दल के साथ गांव में जाते. हैजा व चेचक जैसी बीमारियों का इलाज कर रहे डॉक्टरों का हाथ बंटाते. गांववालों के लिए दवाई की व्यवस्था करते. उन्हीं दिनों उन्होंने धार्मिक उत्सवों के जरिए युवाओं में सामुदायिकता की भावना जगाने का काम शुरू किया. जिस सुभाष को कॉलेज से अँगरेज़ प्रोफेसर ने निकाल दिया था, उसी ने बाद में आईसीएस के परीक्षा में सेलेक्ट होकर पद छोड़ दिया.

सुभाष चन्द्र बोस ने रखी थी महिला रेजिमेंट की नींव

वो 12 जुलाई 1943 का दिन था. सिंगापुर में नेता जी सुभाष चंद्र बोस की सभा आयोजित की गई थी. भीड़ यहां मौजूद थी, मगर इस भीड़ में कुछ ऐसा था जो सभी को आकर्षित कर रहा था. वो था सभा में मलाया और थाईलैंड से 25 हजार महिलाओं का यहां पहुंचना हुआ.

ये महिलाएं यहां नेता जी के विचारों को सुनने के लिए पहुंची थीं.

‘तुम मुझे खून दो और मैं तुम्हें आजादी दूंगा’. नेता जी के इन शब्दों ने यहां आई सभी महिलाओं के दिलों में वो आग भड़का दी, जो देश की आजादी के लिए उस वक्त सबसे ज्यादा जरुरी थी.

इसके बाद वो दिन आया, जब हुआ रानी झांसी रेजिमेंट का गठन!  15 जुलाई 1943 को 20 महिला सैनिकों की भर्ती के साथ एक रेजिमेंट बनाया गया और इस रेजीमेंट को नाम दिया गया  ‘रानी झांसी रेजिमेंट’! असल में सुभाष चंद्र बोस जानते थे कि सिर्फ पुरुषों की भागीदारी से आजादी की जंग नहीं जीती जा सकती.

हालांकि, जब सुभाष चंद्र बोस ने इस रेजिमेंट के बनने की घोषणा की तो लोग चौंके भी. ऐसा इसलिए क्योंकि उस वक्त समाज पितृसत्तात्मक यानी पुरुष प्रधान था. वहीं दूसरी तरफ महिलाओं में इसे लेकर उत्साह था. जुलाई 1943 के आखिर में इस रेजिमेंट में 50 और महिला सैनिकों की भर्ती की गई. डॉ लक्ष्मी स्वामीनाथन को रेजीमेंट का पहला कैप्टन बनाया गया. उन्होंने अंग्रेजों से मोर्चाबंदी में मुख्य भूमिका निभाई.

इसके बाद अगस्त के महीने में 500 महिलाओं को सैन्य प्रशिक्षण के लिए चुना गया. इसमें से सिर्फ 150 महिला सैनिकों का ही चयन रानी झांसी रेजीमेंट के लिए हुआ. 22 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने रानी झांसी रेजीमेंट की घोषणा पूरी दुनिया में कर दी. जब नंवबर का महीना आया, तब इस रेजीमेंट में महिलाओं की संख्या 300 के पास पहुंच चुकी थी. 

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की शिकस्त के बाद ब्रिटिश सेनाओं ने आजाद हिंद फ़ौज के सैनिकों की भी धरपकड़ शुरू की. इसी धरपकड़ में सिंगापुर में इस रेजिमेंट की कैप्टन डॉ. लक्ष्मी सहगल को गिरफ्तार किया गया.

कहा जाता है कि इनकी गिरफ्तारी के बाद ही रेजिमेंट को भंग करने की घोषणा कर दी गई. यह लक्ष्मी सहगल की सूझ-बूझ और औरतों को प्रोत्साहित करने का तरीका ही था, जिसके दम पर ‘रानी झांसी रेजिमेंट’ काफी समय तक ताकतवर बनी रही.

एक बार जैसे ही उन्हें पकड़ा गया सब को इस बात का डर सता गया कि कहीं रेजिमेंट से जुड़ी सारी बातें सामने न आ जाए. अगर ऐसा हो जाता तो बाकी महिलाओं के लिए यह एक बड़ी परेशानी बन जाता. यही कारण था कि इसे हमेशा के लिए ख़त्म करने का फैसला ले लिया गया.

इसके साथ ही बहादुर महिलाओं की इस रेजिमेंट का अंत हो गया.

सुभाष चन्द्र बोस का योगदान आजादी की लड़ाई में अतुलनीय है. न सिर्फ देश के लिए अपने को झोंक देना बल्कि रानी झाँसी रेजिमेंट के द्वारा महिला सशक्तिकरण के हस्ताक्षर बनकर उभरे नेताजी.

 

Dr Pooja Tripathi

Dr Pooja Tripathi