Kasturba- The Gandhi who stood by Mahatma

Kasturba- The Gandhi who stood by Mahatma

 

गाँधी से महात्मा के सफ़र में खड़ी रही कस्तूरबा

साल था 1942 और भारत छोड़ो आन्दोलन के तहत महात्मा गाँधी बम्बई में जनसभा को संबोधित करने वाले थे. एक दिन पहले ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के सारे बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया. बिरला हाउस में कांग्रेस सेवादल के बीच ये बात होने लगी कि वर्तमान में कोई ऐसा नेता नहीं है जो गाँधी के कद का हो और हजारों की भीड़ को संबोधित कर पाए.

ब्रोंकाइटिस से बीमार चल रही कस्तूरबा ने कहामैं करुँगी संबोधित”. लोगों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था, अब तक बा ने कोई बड़ी सभा संबोधित नहीं की थी. पर बा तो थी गाँधी ही. उन्होंने एक घंटे में अपना भाषण तैयार किया और चल दी बम्बई के शिवाजी पार्क की ओर. दो लाख के बड़े जनसमूह को रुलाने और क्विट इंडिया मूवमेंट में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने में कस्तूरबा गाँधी के उस भाषण का अहम् योगदान है.

ये थी कस्तूरबा गाँधी. महात्मा गाँधी के साथ उनके सत्यग्रह के पूरे सफ़र में कस्तूरबा एक मजबूत अवलंब की तरह खड़ी रहीं. अपनी तमाम कमजोरियों के साथ मोहनदास के महात्मा बनने की यात्रा को अगर किसी ने सबसे करीब से देखा, तो वह निस्संदेह कस्तूरबा थी. कस्तूरबा एक स्वायत्त व्यक्तित्व की स्वामिनी थी. चाहे वह संपत्ति का पूर्णतः त्याग हो या ब्रह्मचर्य का व्रत, कस्तूरबा ने गांधी के हर निर्णय पर सवाल किया और तब ही माना जब वे स्वयं संतुष्ट हुई. इसकी पुष्टि महात्मा गाँधी अपनी जीवनी में भी करते हैं.

मसलन कस्तूरबा ने भले ही गहने, रेशमी कपड़ों का त्याग कर दिया हो, पर कांच की पांच लाल चूड़ियाँ उन्होंने हमेशा पहनी. वे इसे अपने सुहाग से जोड़कर देखती थी. यहाँ तक की जब गाँधी के पथ का पालन करते हुए जमनालाल बजाज की पत्नी जानकीदेवी ने भी सभी गहनों का त्याग कर दिया तो गाँधी ने उन्हें चिढाते हुए कहा किइस बूढ़ी का चूड़ियों में कितना मन है”. इस पर बा ने कहाआप कुछ भी कहें, जब तक प्राण रहेंगे, मैं इन्हें नहीं निकालूंगी

अफ्रीका से लेकर चंपारण तक महात्मा के साथ परछाई सी रहने वाली कस्तूरबा होना मुश्किल है. चंपारण में तो महिलाओं की स्थिति को कस्तूरबा ने ही समझा और बापू को अवगत कराया. २२ फरवरी 1944 को जब कस्तूरबा ने अपना शारीर त्याग दिया तब गाँधी एक पेड़ के नीचे तब तक बैठे रहे जब तक चिता की लौ न बुझ गयी. जब आश्रम की लोगों ने उन्हें अन्दर जाने को कहा तो गांधीजी ने कहा “62 सालों का साथ रहा हमारा, बीच में कैसे छोड़ कर चले जाऊं

अंतिम संस्कार के बाद जब अस्थियाँ जमा की गयीं तो पाया गया कि वो पाँच चूड़ियां पूरी तरह से साबुत थी. महात्मा गाँधी ने अपने अंत समय तक उन पाँच चूड़ियों को सहेज कर रखा.

बा की पुण्यतिथि पर उन्हें नमन.

 

Dr Pooja Tripathi

Dr Pooja Tripathi